कैसे बना ब्रह्मांड…

चौदह साल के लंबे इंतजार के बाद पृथ्वी की अनेक गुत्थियां सुलझने को हैं और वैज्ञानिकों की मानें तो वह अब तक के सबसे विशाल परीक्षण के जरिए ब्रह्मांड की उत्पत्ति के रहस्य का पता लगाने की कोशिश करेंगे।

10 सितंबर को दुनियाभर के लगभग 2500 वैज्ञानिक जेनेवा में धरती के 330 फुट नीचे लार्ज हैड्रान कोलाइडर एलएचसी नाम की मशीन के जरिए भौतिकी का सबसे बड़ा प्रयोग करेंगे। ब्रह्मांड की उत्पत्ति एक महाविस्फोट से हुई थी और वैज्ञानिक 27 किलोमीटर लंबी इस मशीन से विस्फोट कर एक बार फिर वैसी ही परिस्थितियां पैदा करेंगे ताकि दुनिया के निर्माण के रहस्य का पता लगाया जा सके।

इस प्रयोग के विरोधी वैज्ञानिकों का कहना है कि इस परीक्षण से धरती एक ब्लैक होल में समा सकती है वहीं प्रयोग करने वाले वैज्ञानिक ऐसी आशंकाओं को निराधार बता रहे हैं। प्रयोग से जुड़े भारतीय वैज्ञानिक वाईपी वियोगी का कहना है कि एलएचसी से धरती के नष्ट होने का कोई खतरा नहीं है, क्योंकि यदि ऐसा कोई खतरा होता तो वैज्ञानिक यह प्रयोग करने का जोखिम नहीं उठाते।

उन्होंने कहा कि ब्रह्मांड की उम्र लगभग 14 अरब वर्ष और धरती की उत्पत्ति की उम्र करीब साढ़े चार अरब वर्ष मानी जाती है। तब से लेकर अब तक ब्रह्मांड में न जाने कितनी टक्कर हुई हैं, लेकिन धरती के अस्तित्व पर कभी कोई संकट नहीं आया।

वैज्ञानिक अमिताभ पांडे का भी कुछ ऐसा ही मानना है। उनका कहना है कि ब्रह्मांड में उच्च ऊर्जा वाले प्रोटोन आपस में टकराते हैं, जबकि इस प्रयोग के दौरान अत्यंत कम ऊर्जा वाले प्रोटोनों की टक्कर कराई जाएगी इसलिए धरती को कोई खतरा नहीं है।

उन्होंने कहा कि प्रयोग का उद्देश्य यही पता लगाना है कि पदार्थ कहां से आया और कैसे बना। प्रयोग को अंजाम देने वाला यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन इससे धरती को कोई खतरा नहीं मानता, जबकि दूसरी ओर विश्व के कई वैज्ञानिक एलएचसी से धरती के नष्ट हो जाने के खतरे की आशंका भी जता रहे हैं।

ब्रिटिश अखबार डेली मेल ने ऐसे कई वैज्ञानिकों के हवाले से कहा है कि इससे धरती को खतरा है और सबसे पहले तबाही हिन्द महासागर से शुरू होगी। उनका कहना है कि धरती की तबाही में 10 सितंबर से लेकर चार साल तक का वक्त लग सकता है।

एलएचसी भौतिकी का सबसे बड़ा प्रयोग है, जिस पर अब तक 384 अरब डॉलर की राशि खर्च हो चुकी है। इस मशीन का बटन जर्मन वैज्ञानिक डॉक्टर ईवान्स के हाथों में है। प्रयोग में लगे वैज्ञानिकों का कहना है कि यह अनुसंधान सेकेंड के अरबवें हिस्से में होगा इसलिए यदि कोई ब्लैक होल बना भी तो वह एक जगह से दूसरी जगह पहुंचने में ही खत्म हो जाएगा।

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